कहते हैं कि आज से 350 साल पहले जब कश्मीरी पंडित गुरु तेग बहादुर के पास शरणागत हुए और औरंगजेब के अत्याचारों, जबरन धर्म परिवर्तन की बात की तो सरबंशदानी गुरु गोविंद सिंह ने स्वयं अपने पिता को पंडितों के लिए बलिदान देने हेतु प्रेरित किया। तब केवल दस साल आयु में ही। पिता ही क्यों आगे तो अपने चारों पुत्रों, माता का भी बलिदान किया।
कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है। 1984 में अपनी माता इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपना कुख्यात बयान दिया था कि, “जब एक पेड़ गिरता है तो जमीन तो कांपती ही है।” यह अपने आम कांग्रेस पार्टी के नेताओं को साफ़ इशारा था कि बदला लिया जाय। इसके बाद न दिल्ली में ही दर्जनों स्थानों पर वरन पूरे देश में सिखों का नरसंहार किया जाता है। सिखों के आखिरी गुरु गोविंद सिंह ने अपने चारों पुत्रों की मृत्यु के बाद अपने सिखों के लिए कहा था कि “चार मुए तो क्या हुआ, जीवत कई हजार”
समय की विडंबना देखिए उनके ही हजारों पुत्र, पुत्रियाँ, वृद्ध सिख 1984 में मारे गए। एक पारसी पिता और कश्मीरी पंडित माता के पुत्र राजीव गांधी के इस बयान के बाद (और सिखों के खिलाफ बाकायदा तमाम झूठी अफवाहें योजना बना कर फैलाने के बाद) क्रूरता से मारे जाते हैं।
आज भी वो विधवाएं, उनके वयस्क हो गए बच्चे उस भयानक यंत्रणा को झेल रहे हैं। उनके बाप दादा भी 1947 में कुछ नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा के कारण लाखों की संख्या में मारे गए, महिलाओं ने बलात्कार झेले।
आज 42 साल बाद भी न्याय अधूरा है।
न तो कांग्रेस सरकार के पहले आयोग ने इसके कारणों की जांच की और ऐसा ही बीजेपी सरकार द्वारा 2002 में बने आयोग ने अपना फर्ज निभाया। रिपोर्ट भी 5 साल बाद 2005 में दी। राजीव गांधी के बयान को जैसे सुना ही नहीं और तमाम बड़े कांग्रेस नेताओं और पुलिस अधिकारियों पर भी आँच नहीं आने दी। मात्र सब इंस्पेक्टर स्तर के और नीचे के पुलिस के गुंडों, कुछ कांग्रेसी छुटभईयों को ही दोषी बताया।
जैसे 2002 के गुजरात दंगों में आयोग ने किया, जैसा 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद बने आयोग ने सपा पार्टी की बखूबी रक्षा की और 2014 चुनाव में पहली बार बीजेपी को यूपी से सात गुना ज्यादा यानि 72 सीट जीतने में अपना पावन योगदान दिया।
भागलपुर, नेल्ली हत्याकांड में क्या हुआ?
भाई साहब एक अलिखित समझौता होता है सारी पूंजीवादी पार्टियों में कि टॉप वाले गैंग लीडर का बाल बांका नहीं होना चाहिए। शायद भारत के शीर्ष उद्योगपतियों द्वारा अपनी ही सारी बड़ी और छोटी पार्टियों के नेताओं को किसी अंबानी, अदानी के बच्चों की शादी में ही साफ़ निर्देश दे दिए जाते हैं।
पंजाब में केंद्र और राज्य सरकार द्वारा 1984 के सिखों के नरसंहार के बाद कथित खालिस्तान आंदोलन के दौरान नब्बे के दशक में कुछ सालों तक पंजाब के 25 हजार सिख नवयुवकों, महिलाओं, बच्चों के गायब होने, मुठभेड़ में मारे जाने पर ” सतलुज ” फिल्म की बहुत चर्चा है। फिल्म देख ली है लेकिन हमारी चर्चा का केंद्र दूसरा ही रहेगा। हम कई रंग रूपों की पूंजीवादी पार्टियों चाहे कांग्रेस, बीजेपी, सपा आदि हो, इन सभी के द्वारा किस तरह सात दशकों से जारी दंगों, नरसंहारों हेतु गठित जांच आयोगों के नाटक किए गए हैं, उन्हीं पर केंद्रित रहेंगे।
खासकर 1984 के बाद रंगनाथ मिश्र, नानावती के (और वैसे गुजरात में 2002 और 2013 में मुजफ्फरनगर के नरसंहार में भी आयोगों ने यही सब किया। तुलसी बाबा कह गए हैं कि समरथ को नहीं दोष गुसाई। आयोगों पर पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज यानि पीयूसीएल और पीयूडीआर (पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स) की 2025 की शानदार विस्तृत रिपोर्ट जो 45 पेज में है, के आधार पर। उस आयोग की रिपोर्ट और एक बार फिर राज्यसत्ता का पोस्टमार्टम, पर्दाफाश करेंगे।
और मूल बात कि पूंजीवादी राज्य सत्ता किसकी सेवा करती है, इस पर एक वैज्ञानिक नजर डालेंगे। इससे पहले समाजवादी देशों जैसे 1917 में बने रूस और 1949 में बने चीन पर कुछ चर्चा प्रासंगिक रहेगी। ये भी कि आम मेहनतकश जनता पूंजीवादी जनतंत्र में कैसे रहती है और समाजवादी जनतंत्र में उसका जीवन कैसा होता है, कैसा था क्या हो गया है। उनमें पूंजीवाद की पुनर्स्थापना के बाद। हालांकि झंडा अभी भी लाल ही है, नाम भी वही। पर अंदर का माल या अंतर्वस्तु में आधारभूत सड़न आ चुकी है।
लीजिये भूमिका शुरू की जाए।
मजदूरों के राज को मजबूती से जमीन पर उतारने वाले भगत सिंह के उस्ताद व्लादिमीर इलयिच लेनिन ने पेरिस कम्यून के मात्र 70 दिन के अनुभव से सबक लेते हुए तमाम दुनिया के ताकतवर, संपन्न शत्रु वर्ग शासित देशों द्वारा घिरे होने के बावजूद भी मानो किसी जादू से दुनिया का पहला वैज्ञानिक समाजवादी प्रयोग सफल कर दिखा दिया।
लेकिन दुश्मनों द्वारा भेजी गई एक विष कन्या की गोली से पैदा घाव के संक्रमण फैलने और 1920 की दुनिया में एक एंटी बायोटिक दवा तक न बनने के फलस्वरूप मेहनतकश दुनिया ने बिल्कुल असमय ही आज मात्र 54 साल की उम्र में अपने कोहिनूर बल्कि पारस पत्थर को खो दिया। फिर अनेक न टाले जाने वाले कारणों से 1956 में सोवियत संघ में पूंजीवाद की पुनर्स्थापना हो गई।
अकल से कतई पैदल लोग ही किसी ऐसे विज्ञान आधारित समाज व्यवस्था को फेल कह सकते हैं।
क्या आज आप लोग जो हवाई जहाज देखते हैं उसे एक दो या दर्जनों बार सुधारा नहीं गया। यही बिजली, कार, रेल के बारे नहीं है। तो फिर सोवियत संघ, चीन के मात्र दो प्रयोगों को असफल कैसे कह सकते हैं।
सोवियत रूस में 1956 में अमेरिका समर्थित गद्दार ख्रुश्चेव सत्ता में आ गया।
आज चीन रूस मजदूरों के नर्क हैं, भारत से बड़े और ज्यादा पूंजीपति वहां पर हैं।
लेकिन 1949 में उधर चीन में लेनिन के महान शिष्य माओ ने एक ऐसे देश को 1976 में अपनी मौत तक दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्था बना डाला। वह देश जहां पर मात्र 27 साल पहले एक माचिस भी नहीं बनती थी, हर साल अकाल पड़ते, पीली नदी का कहर बरपा होता था और शंघाई शहर में ही रोज 200 लोग गरीबी, भूख के कारण रोज ही मृत पाए जाते थे। चीन में 1949 में औसत आयु केवल 35 वर्ष थी जो 1976 तक यानि 27 सालों में ही 68 साल हो गई।
माओ त्से तुंग के बेयरफुट डॉक्टर मॉडल को खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1988 की अलमाअत्ता (कजाखस्तान) बैठक में 2000 तक सबके लिए स्वास्थ्य का आधार माना था।
दोनों देशों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, न्याय व्यवस्था और औद्योगीकरण में दुनिया भर को रास्ता दिखाया। स्टालिन ने दुनिया को पंच वर्षीय योजना का विचार दिया। आज की दुनियां में शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में जहां बाजार हावी है वह स्थिति दोनों ही देशों में लगभग अनुपस्थित थी। आदमी मुनाफे से ऊपर था।
उसी मजबूत आधार पर गद्दार देंग श्याओ पेंग ने आज के चीन को बनाया।
उधर सोवियत संघ में लेनिन की 1924 में ही बेवक्त मौत के बाद स्टालिन ने वही काम किया जो माओ ने चीन में किया था । एक भुखमरी, वेश्यावृत्ति के शिकार देश को इतना शक्तिशाली बना दिया कि उसने न केवल अपने मजदूर राज की, परंतु पूरी दुनिया की दूसरे विश्व युद्ध में फासीवाद से रक्षा की। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और औद्योगीकरण में सोवियत संघ का विकास 1930 की दुनियां भर में व्याप्त महामंदी के समय भी दिन दुगनी रात चौगुनी प्रगति कर रहा था।
यहां पर भूमिका समाप्त हो गई है।
अब सीधे पीयूडीआर की नवंबर 2025 की शानदार रिपोर्ट पर आते हैं, जो न केवल भाजपा कांग्रेस की बल्कि तमाम पूंजीवादी पार्टियों की अग्नि परीक्षा लेती है। सरकार ( सीबीआई) बनाम सज्जन कुमार एवं अन्य नाम से दिसंबर 2018 में आए हाई कोर्ट के निर्णय को दो सदस्य वाले जजों ने दिया, और जजमेंट को लिखने वाले थे माननीय न्यायाधीश एस मुरलीधर जिन्होंने स्वीकार किया था कि इस नरसंहार के 30 सालों के बाद आए इस निर्णय के द्वारा भारत की राज्य सत्ता के अंग न्यायपालिका की अग्नि परीक्षा हुई है ।
ध्यान रहे जस्टिस मुरलीधर इस समय इसराइल द्वारा 20 हजार मासूम फलस्तीन बच्चों के निर्मम कत्ल की जांच करने वाले अंतरराष्ट्रीय पैनल की अध्यक्षता कर रहे हैं।
पीयूडीआर की रिपोर्ट का शीर्षक है ” दिल्ली 1984 : दी लोंग आफ्टरमैथ एंड स्ट्रगल ऑफ 41 इयर्स ऑफ क्रिमिनल इंजस्टिस एंड स्ट्रगल ऑफ सरवाइवर्स।”
राज्य बनाम सज्जन कुमार एवं अन्य, 2018″ के नाम से यह केस जाना जाता है!
पीयूडीआर रिपोर्ट:
7 साल हुए अभी भी दोषियों पर मुकदमा धीमी गति से चल रहा है। 1984 के सिख विरोधी दंगे जिसमें अब तक 2733 लोग मारे गए (इससे भी ज्यादा अनऑफिशियली दंगे के शिकार बने)।
सिख नरसंहार 1 से 4 नवंबर, 1984 को भीषणतम रहा।
बीच में भी पीयूडीआर ने 17 नवंबर 1984 की रिपोर्ट इस पर निकाली, जिसने बताया कि किस प्रकार यह दंगे पूर्व नियोजित और संगठित थे, जिसमें स्थानीय कांग्रेस नेता, बड़े नेता और सरकारी अधिकारी शामिल थे। परिमाण और तीव्रता में यह राज्य प्रायोजित दंगे थे। पुलिस एवं अन्य द्वारा दिल्ली में योजना बना कर अफवाह फैलाई गई कि सिख इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मिठाई बांट रहे हैं, पीने के पानी में जहर मिलाया जा रहा है, दिए जलाए जा रहे हैं आदि।
सिखों ने बताया कि बाकायदा मीटिंग में तय हुआ कि कैसे यमुना पार के लोगों को मारा जाए। इसके लिए वोटर लिस्ट और राशन कार्ड द्वारा सिख परिवारों की पहचान की गई। उदाहरण के लिए करोलबाग के प्रकाश नगर में वोटर लिस्ट द्वारा दुकानों और घरों को निशाना बनाया। नानावती आयोग की रिपोर्ट बताती है कि डीटीसी बसों में दंगाई ढोए गए थे। लोकल नेताओं और पुलिस की मिली भगत विभिन्न आयोगों की रिपोर्ट से जाहिर हो रही थी।
खासकर दिल्ली के 1947 के शरणार्थी बस्ती वाली जगह जैसे त्रिलोकपुरी, सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी और दक्षिण पश्चिम दिल्ली के एरियाऔर जैसे पालम और कैंट एरिया। पुलिस ने दूर-दूर के स्थानों जैसे दक्षिण पश्चिम दिल्ली और पूर्वी दिल्ली के सैकड़ो सिखों की हत्या को जानबूझ कर केवल एक ही एफआईआर में दर्ज किया जिससे मामले की जांच में बाधा आए और जांच में बहुत देर हो जाए।
यहां तक कि 2 नवंबर को ही देश के गृहमंत्री और कानून मंत्री को दो विपक्षी सांसदों ने रेलवे में पंजाब से आ रहे ट्रेनों को आर्मी द्वारा सुरक्षा देने की मांग की। लेकिन कोई निर्णय नहीं हुआ और दिल्ली रेलवे स्टेशन में 50 के करीब सिख यात्रियों को ट्रेनों से खींचकर, मारकर ट्रैक में ही फेंक दिया गया। शाम को उस समय के गोदी मीडिया दूरदर्शन ने भी हत्या का संज्ञान नहीं लिया बल्कि खंडन किया। वास्तव में यह दंगा नहीं नरसंहार था। दंगा तो कुछ लोगों के समूहों द्वारा हिंसा को कहते हैं जबकि यह ऐसी नहीं थी।
लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि नागरिक समाज, जांच आयोगों, सरकार और अदालत में भी दंगा शब्द प्रयोग किया ना कि नरसंहार! पीयूडीआर ने यह रिपोर्ट पीड़ित परिवारों के इंटरव्यू, जांच आयोगों की रिपोर्ट, अदालत के फैसलों के गहन अध्ययन के बाद तैयार की। दिल्ली के स्थानों खास कर तिलक नगर एवं अन्य स्थानों और विभिन्न शहरों का भी अध्ययन किया गया। यह रिपोर्ट जितनी विस्तृत नहीं है उससे ज्यादा अधिकतम संपूर्ण विवरण के साथ तैयार है।
फिर भी इसे पूर्णता प्रदान करने में कई टाली जा सकने वाली बाधाएं रास्ते में आई।
नवंबर 84 से वेद मारवाह, पुलिस आयुक्त से लेकर 2020 की जस्टिस धींगरा की एसआईटी रिपोर्ट तक सुप्रीम कोर्ट को यह रिपोर्ट भेजी गई। इसमें 11 कमेटियां, दो जांच आयोग एवं दो एसआईटी बनाने का आदेश दिया जा चुका है। 1992 में नरसंहार के 8 साल बाद पी मयूडीआर ने भारत की सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को की घोर असफलता का संज्ञान लिया। तब से आज 2025 तक इसमें और भी गिरावट आई है ।
पहला जांच आयोग:
26 अप्रैल 1985 को हिंसा के छह माह बाद रंगनाथ मिश्र आयोग बना जिसने अगस्त 1986 में रिपोर्ट दी। लगभग 16 माह बाद। यह 23 फरवरी 1987 को या हिंसा के 3 साल बाद संसद में रखी गई। दूसरा नानावटी आयोग 2000 में बना इसने भी रिपोर्ट देने में 5 साल लगा दिए।
रंगनाथ मिश्र आयोग का तो कार्य ही यह था कि वह संगठित हिंसा के आरोपों की जांच करे, बजाय इसके कि इसका काम होता कि अहिंसा के मूल कारकों को खोजें। फिर पीड़ितों के नाम पते सार्वजनिक करना इस आयोग की घोर असंवेदनशीलता को दिखाता है। फिर इन कैमरा रिकॉर्डिंग करना घाव पर नमक मिर्च लगाने जैसा था। इसने पीड़ितों की सुरक्षा को और भी खतरे में डाल दिया। 2900 एफिडेविट में से 2200 तो पीड़ितों के ही खिलाफ थे।
मात्र 600 यानी पांचवाँ भाग एफिडेविट ही उनके पक्ष में थे। जहां पर सबसे बुरी हिंसा हुई वहां के एफिडेविट में तो और भी बुरी स्थिति थी। संगठित हिंसा के बारे में भी आयोग ने माना कि यह स्वत: स्फूर्त है। यानि व्यापक जनता की मात्र प्रतिक्रिया थी जो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी। परिणाम यह रहा कि लोग आयोग के सामने बयान देने से ही कतराने लगे थे। संगठित हिंसा के लिए इसने राजीव गांधी और बड़े कांग्रेसी नेताओं को की शांति की अपीलों पर ही ध्यान दिया और इस प्रकार उन्हें बड़ी राहत दी।
कांग्रेस पार्टी यहां तक पुलिस को बख्श दिया और कुछ छुटभैया कांग्रेसी नेताओं और उनके स्थानीय समर्थकों को ही इसका जिम्मेदार बताया। पीड़ितों ने जब बहुमत से वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एचकेएल भगत का नाम लिया तो उस पर भी ध्यान नहीं दिया गया। इस आयोग ने सिखों ही नहीं बल्कि न्याय पसंद संवेदनशील आम भारतीयों को भी बहुत निराश किया।
दूसरा आयोग:
नानावटी आयोग भाजपा की एनडीए सरकार ने 2000 में बनाया। एक सदस्य के इस आयोग को हिंसा के कारणों की जांच करनी थी। हालांकि इसने माना कि कांग्रेस के बड़े नेताओं जैसे जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार, बलवंत खोकर, धर्मदास शास्त्री आदि के खिलाफ पर्याप्त गवाह है और उनको इसका जिम्मेदार भी माना। लेकिन बाद में मात्र बड़े नेताओं जैसे गृहमंत्री नरसिम्हा राव, पुलिस अधिकारी और अन्य को ही समन करना ठीक समझा, जिनका नाम पीड़ितों ने बताया था। इसने माना कि यह संगठित हिंसा थी जो बड़े एवं प्रभावशाली नेताओं द्वारा की गई थी।
नानावती आयोग ने कहा कि नरसिम्हा राव पर 20 साल बाद पीड़ितों का आरोप लगाना दुर्भावना पूर्ण है। राव ने समय-समय पर बिना देरी के उचित कार्रवाई की थी। 2004 में कॉमर्स मंत्री रहे कमलनाथ पर भी आयोग ने अपनी कृपा बरसाई, जबकि उन पर श्री रकाबगंज गुरुद्वारा में हिंसा का आरोप था।
(दिल्ली के तमाम ऐतिहासिक गुरुद्वारों में से एक श्री रकाबगंज का नाम भारत में बड़े ही आदर से लिया जाता है। क्योंकि शीशगंज गुरुद्वारे में नवम गुरु तेग बहादुर की शहादत के बाद उनके एक भक्त ने उनके धड़ का संस्कार यहीं पर किया था, जहां उसने गुरु जी के शरीर के अंतिम संस्कार हेतु अपनी झोपड़ी में ही आग लगा दी थी और इस प्रकार नवम गुरु को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी।)
दो गवाहों के बयानों को भरोसेमंद ही नहीं माना गया। बहाना वही 20 साल का। इसके विपरीत एक दलाल पत्रकार के बयान पर आयोग ने भरोसा किया, जिसने कमलनाथ का बचाव किया। दिल्ली की कानून व्यवस्था के सबसे ज्यादा जिम्मेदार सर्वोच्च अधिकारी लेफ्टिनेंट गवर्नर और पुलिस कमिश्नर पर भी आयोग ने कोई आंच नहीं आने दी। डीसीपी आमोद कंठ भी आराम से दोष मुक्त कर दिए गए।
आयोग ने एक तरफ यह तो माना कि बाकायदा पांच मामलों में हथियारबंद भीड़ डीटीसी की बसों में बैठकर आई थी। लेकिन अंत में उनको भी आरोप मुक्त कर दिया गया। ( जैसे राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किया था)। नानावटी ने अपनी वर्गीय पक्षधरता दिखाते हुए बिल्कुल निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों में जैसे सब इंस्पेक्टर और दुकानों से सामान लूटने वाले मामूली गरीबों को ही अपराधी बताया। नानावती आयोग रिपोर्ट देने में 5 वर्ष की देरी का भी महा दोषी है।
दोनों ही आयोगों की शासक वर्ग के प्रति प्यार, निष्ठा और समर्पण साफ नजर आता है।
और क्या यह दो ही आयोग असफल रहे? पीयूडीआर की रिपोर्ट बताती है कि यह एक भ्रांति है कि आयोग का बनना सामान्य आपराधिक जांच का विकल्प हो सकता है। यहां केवल 1984 के नरसंहार की ही बात नहीं हो रही है बल्कि अन्य दंगों में भी यही हुआ। जैसे भागलपुर, नेल्ली, गुजरात का 2002 का दंगा और मुलायम सिंह यादव के काल में हुआ 2013 का दंगा। उस सब में भी आयोगों ने यही किया। इसे ही पूंजीवादी जनतंत्र कहते हैं। इनकी तुलना जरा चीन रूस के मजदूर किसानों के राज या समाजवादी लोकतंत्र से कर सकते हैं।
2013 मुजफ्फरनगर के दंगों में विष्णु सहाय आयोग ने समाजवादी पार्टी को बिल्कुल साफ क्लीन चिट दे दी। यह कितनी क्लीन चिट है यह नकुल साहनी की 2013 के दंगों पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म “मुजफ्फरनगर बाकी है” से जाहिर होता है!
उसे देख लीजिए 1984, गुजरात, सतलुज सब समझ आ जाएगा।
अंत में, 2004 और 2009 में चंद सीटों पर सिमटने वाली भारतीय जनता पार्टी को पहली बार उत्तर प्रदेश में 80 में से 72 सीटें मिलती हैं। और यह भी पहली बार होता है कि आजादी के बाद उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद सदन में नहीं पहुंच पाया। यहां तक हमने पीयूडीआर की 2025 की रिपोर्ट के केवल 7 या 8 पेज ही का ही अध्ययन किया है। इसके कुल पेजों की संख्या संख्या 45 है। हिम्मत हुई तो ही आगे पढ़ सकता हूं।
अभी इतना ही।
कम कहा ज्यादा समझना।
(डॉक्टर उमेश चंदोला का लेख)